धर्मनगरी हरिद्वार सहित देशभर में इस बार होलिका दहन 3 तारीख को ग्रहण होने के कारण 2 मार्च को ही श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शुभ मुहूर्त और ग्रहण के प्रभाव को देखते हुए श्रद्धालुओं ने एक दिन पहले ही होलिका दहन कर परंपरा निभाई। इस मौके पर लोगों ने बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया।होलिका दहन का पर्व आस्था, विश्वास और विजय का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि भक्त Prahlad की अटूट भक्ति और सत्य की शक्ति के आगे अहंकार और अत्याचार का अंत हुआ था। जब दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को भगवान की भक्ति से रोकना चाहा, तब होलिका की अग्नि में भी प्रह्लाद सुरक्षित रहे और बुराई का अंत हुआ।
इसी आस्था के साथ श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से होलिका दहन किया और अपने जीवन से नकारात्मकता, द्वेष और अहंकार को दूर करने का संकल्प लिया।
“होलिका दहन हमें सिखाता है कि चाहे परिस्थितियां कैसी भी हों, अंत में जीत सत्य और अच्छाई की ही होती है।”
होलिका दहन के साथ ही होली का उल्लास भी चरम पर पहुंच गया है। रंगों का यह पर्व आपसी प्रेम, भाईचारे और सौहार्द का संदेश देता है। मान्यता है कि इस दिन लोग पुराने गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे को गले लगाते हैं। यहां तक कि दुश्मन भी इस दिन दोस्त बन जाते हैं।
लोगों का कहना है कि होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि रिश्तों में मिठास घोलने और समाज में एकता का रंग भरने का अवसर है।
ग्रहण के कारण एक दिन पहले मनाया गया होलिका दहन यह संदेश दे गया
